मैं स्वघोषित श्रेष्ठ पत्रकार अर्णब गोस्वामी की एक बहस देख रहा था। व्यक्तिगत रूप से मुझे उनकी पत्रकारिता अरुचिकर हैं, किन्तु विषय अच्छा था। बहस हो रही थी कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में यदि तिरंगा लहराने का आदेश केंद्र सरकार देती है तो इसमें क्या गलत है?
पहली बात तो ये कि केंद्र सरकार के पास अधिकार है ऐसा आदेश देने का। दूसरी बात ये कि यदि केंद्र सरकार भारतीयता (भारत एक सम्प्रभुत्व वाला राष्ट्र है) के भाव को बढाने के लिए तिरंगे का सहारा ले रही है तो ये सराहनीय भी है। यूरोप के एक नए देश लिथुएनिया में मैंने देखा कि बहुत सी जगहों पर उनके राष्ट्रीय ध्वज के साथ साथ यूरोपियन यूनियन का ध्वज भी लहरा रहा था। मुझे उस देश के संसद में कुछ ६-७ दिनों का कार्य था। मुझे अवसर मिला तो मैंने संसद के एक अधिकारी से ये पूछा कि हर जगह राष्ट्रीय ध्वज के संग यूरोपियन संघ के ध्वज क्यूँ हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि यूरोपियन संघ के ध्वज से बाहरियों को ये सन्देश मिलता है कि वो शक्तिशाली यूरोपियन संघ के एक अंग हैं। उनका देश 1991 में ही संपूर्ण रूप से प्रजातांत्रिक स्वतंत्र राष्ट्र बना है, अपने ही देशवासियों में राष्ट्रीयता का भाव जगाने में राष्ट्रीय ध्वज महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः उनके अनुसार ध्वजों के होने का कुछ तो महत्व अवश्य है।
मैं यह नहीं कह रहा कि ध्वज एक मात्र युक्ति है देश के प्रति लगाव बढाने का, किन्तु ये एक युक्ति अवश्य है। कितनी प्रभावी है ये भी नहीं कह सकता, किन्तु कुछ प्रभावी तो है ही। पिछले ही महीने मैं केरल में घूम रहा था। 26 जनवरी की सुबह मेरी कार कन्याकुमारी से केरल में पोंमुडी, केरल की दिशा में जा रही थी। मैंने मार्ग में ढेर सारे लाल रंग के झंडे देखे, कांग्रेस के झंडे देखे, भाजपा के भी झंडे देखे, किन्तु 26 जनवरी के दिन तिरंगा नही दिख रहा था। बहुत देर बात मार्ग में एक बस अड्डा दिखा, वहां पर तिरंगा लहरा रहा था। अब तनिक विचार करिए कि वो सरकारी बस अड्डा ना होता तो शायद मुझे तिरंगा और कठिनाई से दिखता। थोड़ा और विचार करिए कि वहां के विद्यार्थियों को कितना लगाव होगा तिरंगे से यदि उन्हें तिरंगा मात्र राष्ट्रीय दिवसों पर ही दिखे वो भी कहीं कहीं। इतनी भी क्या बौद्धिक विवशता है कि हम अपने राष्ट्रीय ध्वज को देश में कहीं फहराने का आदेश नहीं स्वीकार सकते। किसी बच्चे से पूछा गया था कि गणतंत्र दिवस क्या होता है, उसने कहा कि उस दिन उसे स्कूल में लड्डू मिलता है। अगर हम ऐसे ही बौद्धिक स्वतन्त्रता पर देशभाव को छोड़ देंगे और अलग से कुछ कदम नहीं उठाएंगे तो संविधान की जगह पर लड्डू अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।
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