Sunday, November 8, 2015

जय लोकतंत्र

लोग अपने अपने पसंदीदा नेताओं के लिए थोड़ा आलोचनात्मक हो रहे हैं. मेरी एक मित्र प्रधानमंत्री जी की बहुत बड़ी प्रसंशक हैं. आज बिहार नतीजों के उपरान्त वो प्रधानमन्त्री जी को सुझाव दे रही थी। … "प्रधानमंत्री जी, अब अपनी सरकार के काम पे ध्यान दीजिये। महंगाई सर के ऊपर निकल गई उसका कुछ कीजिए। ये विहिप, आरएसएस के बन्दों का मुह बंद कीजिए। और वो करिये जिसके लिए चुना गया है।
आपका अपना, बिहार चुनाव परिणाम।"....
मैंने भी अब अरविन्द केजरीवाल की आलोचना आरम्भ कर दी है.… ".... अभी तक जनलोकायुक्त विधेयक नहीं लाया गया है...."
एक स्वस्थ लोकतंत्र की ये प्राथमिक पहचान होती है कि नागरिक पाल्हा बदलने के लिए अपने विचारों को स्वतंत्र रखें. अच्छा लग रहा है कि कई मित्र अब अपने राजनीतिक दायित्वों को ऐसी ही स्वतन्त्रता से निभा रहे हैं. आशा करता हूँ कि लोग अब ये सब कहना छोड़ दें, कि "मैं पक्का कांग्रेसी हूँ...." ".... हमारे यहां से तो भाजपा को ही वोट है...." ".... चाहे जो हो हम तो बहनजी को ही वोट देंगे....", इत्यादि।।।।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए, एक सफल राष्ट्र के लिए, हमें अपनी राजनीतिक परिपक्वता को बढ़ाना होगा… इस बात को अपना दायित्व समझना होगा.... चाहे हम चाहें या न चाहें, एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राजनीति से हम (एक नागरिक के रूप में) बच तो नहीं सकते. अगर बच रहे हैं अथवा बचना चाह रहे हैं तब तो ये वैसा ही हो गया जैसे हम अपना घर अच्छा बनवाना तो चाहते हैं पर ठेकेदार के चरित्र के बारे में बिना जाने और बिना उससे बात किये हमने उसे ठेका दे दिया हो.
याद रहे, लोकतंत्र में परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से आपको राजनीति प्रभावित करेगी ही, ये आपके ऊपर है कि आप अंधेरे में दीपक लेकर के चलना चाहते हैं या फिर बिना कुछ देखे ही विनाश/विकास की अनिश्चितता का आनंद लेना चाहते हैं.

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