वैसे केजरीवाल जी ने जो अमर्यादित शब्द मोदी जी के लिए बोले थे उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. भले ही कोई राजनैतिक प्रतिद्वंदी हो हमें अपनी शालीनता को नहीं भूलना चाहिए.
वैसे अमर्यादित शब्दों के प्रयोग में मोदी जी भी किसी से कम नहीं। दिल्ली चुनाव प्रचार में उन्होंने केजरीवाल को "नक्सली" बता दिया था और जंगल भेजने की बात की थी. वाराणसी चुनाव प्रचार में उन्होंने केजरीवाल को "AK49" कहा और देशद्रोही से तुलना की थी.
ये बिलकुल सही बात है कि भारत के प्रधानमंत्री के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा ऐसे शब्द बोलना बिल्कुल अनुचित है, और साथ ही में दिल्ली के पूर्व (दिल्ली चुनाव के समय में) मुख्यमंत्री के लिए भी भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अमर्यादित शब्दों का प्रयोग भी अनुचित है.
वैसे इन दोनों ही राजनेताओं का थोड़ा और अवलोकन करें तो ये पता चलेगा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री कई बार आवेश में आ जाते हैं, और कुछ बोल देते हैं, अपितु प्रधानमंत्री जी अपने सोचे समझे भाषण के लिए जाने जाते हैं. पूर्वोक्त उदाहरणों के अलावा बहुत से अवसरों में इन दोनों ने अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया है. जैसे केजरीवल जी ने स्वयम को ही आवेश में आकर "अराजक" कह दिया था, और मोदी जी ने बिहार चुनाव में भी भाषणों के समय शब्दों की मर्यादाएं तोड़ी थी.
वैसे जो बड़ा होता है उससे अधिक अपेक्षा होती है... कोई बड़े को अपशब्द कहे इससे बड़े की साख उतनी नहीं गिरती जितनी साख उसकी स्वयं मर्यादा भंग करने से गिरती है.
शब्दों की मर्यादाभंग करने में बहुत से राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम रहे हैं. "मौत का सौदागर" से लेकर के "नाली के कीड़े" तक, बहुत से उदाहरण हैं. कुछ भी हो ये तो सिद्ध होता ही है राजनीति में शब्दों की मर्यादा का विमर्श अब समाप्त हो रहा है. कदाचित राजनीति में शब्दों की मर्यादा का विमर्श होना भी नहीं चाहिए। "मुंह में राम, बगल में छूरी" से क्या लाभ. "शब्दों में मर्यादा और गतिविधियों में भ्रष्टाचार", इससे क्या लाभ. जो हो सामने आए.
जनता को भी अब सीख जाना चाहिए कि किस प्रकार से शब्दों के पीछे छुपे उद्देश्य एवं अभिप्रेरणा को समझा जाए. उदाहरणार्थ ये देखें कि भाषण में सोच समझ कर अपशब्दों का बोला जाना कितना गलत है, और आपके मुख्यमंत्री कार्यालय में सीबीआई द्वारा करवाए गए अनुचित रेड (तथाकथित) के कारण क्षुब्ध होकर आवेशवश अपशब्दों का बोला जाना कितना गलत है.
ये बहुत अच्छी बात है कि प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है अपनी समझ के अनुरूप राजनेताओं को समझने और निर्णय लेने के लिए, किन्तु हम प्रजातंत्रियों को ये शीघ्राति शीघ्र सीखना होगा कि किस प्रकार से इन परिवर्तनशील राजनीतिक मापदंडों में सही समझ और निर्णय बनाया जाए.
वैसे अमर्यादित शब्दों के प्रयोग में मोदी जी भी किसी से कम नहीं। दिल्ली चुनाव प्रचार में उन्होंने केजरीवाल को "नक्सली" बता दिया था और जंगल भेजने की बात की थी. वाराणसी चुनाव प्रचार में उन्होंने केजरीवाल को "AK49" कहा और देशद्रोही से तुलना की थी.
ये बिलकुल सही बात है कि भारत के प्रधानमंत्री के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा ऐसे शब्द बोलना बिल्कुल अनुचित है, और साथ ही में दिल्ली के पूर्व (दिल्ली चुनाव के समय में) मुख्यमंत्री के लिए भी भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अमर्यादित शब्दों का प्रयोग भी अनुचित है.
वैसे इन दोनों ही राजनेताओं का थोड़ा और अवलोकन करें तो ये पता चलेगा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री कई बार आवेश में आ जाते हैं, और कुछ बोल देते हैं, अपितु प्रधानमंत्री जी अपने सोचे समझे भाषण के लिए जाने जाते हैं. पूर्वोक्त उदाहरणों के अलावा बहुत से अवसरों में इन दोनों ने अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया है. जैसे केजरीवल जी ने स्वयम को ही आवेश में आकर "अराजक" कह दिया था, और मोदी जी ने बिहार चुनाव में भी भाषणों के समय शब्दों की मर्यादाएं तोड़ी थी.
वैसे जो बड़ा होता है उससे अधिक अपेक्षा होती है... कोई बड़े को अपशब्द कहे इससे बड़े की साख उतनी नहीं गिरती जितनी साख उसकी स्वयं मर्यादा भंग करने से गिरती है.
शब्दों की मर्यादाभंग करने में बहुत से राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम रहे हैं. "मौत का सौदागर" से लेकर के "नाली के कीड़े" तक, बहुत से उदाहरण हैं. कुछ भी हो ये तो सिद्ध होता ही है राजनीति में शब्दों की मर्यादा का विमर्श अब समाप्त हो रहा है. कदाचित राजनीति में शब्दों की मर्यादा का विमर्श होना भी नहीं चाहिए। "मुंह में राम, बगल में छूरी" से क्या लाभ. "शब्दों में मर्यादा और गतिविधियों में भ्रष्टाचार", इससे क्या लाभ. जो हो सामने आए.
जनता को भी अब सीख जाना चाहिए कि किस प्रकार से शब्दों के पीछे छुपे उद्देश्य एवं अभिप्रेरणा को समझा जाए. उदाहरणार्थ ये देखें कि भाषण में सोच समझ कर अपशब्दों का बोला जाना कितना गलत है, और आपके मुख्यमंत्री कार्यालय में सीबीआई द्वारा करवाए गए अनुचित रेड (तथाकथित) के कारण क्षुब्ध होकर आवेशवश अपशब्दों का बोला जाना कितना गलत है.
ये बहुत अच्छी बात है कि प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है अपनी समझ के अनुरूप राजनेताओं को समझने और निर्णय लेने के लिए, किन्तु हम प्रजातंत्रियों को ये शीघ्राति शीघ्र सीखना होगा कि किस प्रकार से इन परिवर्तनशील राजनीतिक मापदंडों में सही समझ और निर्णय बनाया जाए.