Tuesday, December 29, 2015

"शब्द-मर्यादाएं" - राजनीति व जनतंत्र के बदलते मापदंड

वैसे केजरीवाल जी ने जो अमर्यादित शब्द मोदी जी के लिए बोले थे उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. भले ही कोई राजनैतिक प्रतिद्वंदी हो हमें अपनी शालीनता को नहीं भूलना चाहिए.

वैसे अमर्यादित शब्दों के प्रयोग में मोदी जी भी किसी से कम नहीं। दिल्ली चुनाव प्रचार में उन्होंने केजरीवाल को "नक्सली" बता दिया था और जंगल भेजने की बात की थी. वाराणसी चुनाव प्रचार में उन्होंने केजरीवाल को "AK49" कहा और देशद्रोही से तुलना की थी.

ये बिलकुल सही बात है कि भारत के प्रधानमंत्री के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा ऐसे शब्द बोलना बिल्कुल अनुचित है, और साथ ही में दिल्ली के पूर्व (दिल्ली चुनाव के समय में) मुख्यमंत्री के लिए भी भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अमर्यादित शब्दों का प्रयोग भी अनुचित है.

वैसे इन दोनों ही राजनेताओं का थोड़ा और अवलोकन करें तो ये पता चलेगा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री कई बार आवेश में आ जाते हैं, और कुछ बोल देते हैं, अपितु प्रधानमंत्री जी अपने सोचे समझे भाषण के लिए जाने जाते हैं. पूर्वोक्त उदाहरणों के अलावा बहुत से अवसरों में इन दोनों ने अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया है. जैसे केजरीवल जी ने स्वयम को ही आवेश में आकर "अराजक" कह दिया था, और मोदी जी ने बिहार चुनाव में भी भाषणों के समय शब्दों की मर्यादाएं तोड़ी थी.

वैसे जो बड़ा होता है उससे अधिक अपेक्षा होती है... कोई बड़े को अपशब्द कहे इससे बड़े की साख उतनी नहीं गिरती जितनी साख उसकी स्वयं मर्यादा भंग करने से गिरती है.

शब्दों की मर्यादाभंग करने में बहुत से राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम रहे हैं. "मौत का सौदागर" से लेकर के "नाली के कीड़े" तक, बहुत से उदाहरण हैं. कुछ भी हो ये तो सिद्ध होता ही है राजनीति में शब्दों की मर्यादा का विमर्श अब समाप्त हो रहा है. कदाचित राजनीति में शब्दों की मर्यादा का विमर्श होना भी नहीं चाहिए। "मुंह में राम, बगल में छूरी" से क्या लाभ. "शब्दों में मर्यादा और गतिविधियों में भ्रष्टाचार", इससे क्या लाभ. जो हो सामने आए.

जनता को भी अब सीख जाना चाहिए कि किस प्रकार से शब्दों के पीछे छुपे उद्देश्य एवं अभिप्रेरणा को समझा जाए. उदाहरणार्थ ये देखें कि भाषण में सोच समझ कर अपशब्दों का बोला जाना कितना गलत है, और आपके मुख्यमंत्री कार्यालय में सीबीआई द्वारा करवाए गए अनुचित रेड (तथाकथित) के कारण क्षुब्ध होकर आवेशवश अपशब्दों का बोला जाना कितना गलत है.

ये बहुत अच्छी बात है कि प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है अपनी समझ के अनुरूप राजनेताओं को समझने और निर्णय लेने के लिए, किन्तु हम प्रजातंत्रियों को ये शीघ्राति शीघ्र सीखना होगा कि  किस प्रकार से इन परिवर्तनशील राजनीतिक मापदंडों में सही समझ और निर्णय बनाया जाए. 

Saturday, December 5, 2015

ब्राह्मणवाद - जातिवाद । Brahmanism - Casteism


मैं सनातनी हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं हिन्दू भी हूँ. ये ब्राह्मणवाद कौन सा नया पाप है? मैंने तो बचपन से लेकर के अभी तक कोई भी भेदभाव नहीं किया जाति के आधार पर. मैं स्वयं को ब्राह्मण इसलिए नहीं कहता हूँ क्यूँकि मैं जन्म के आधार पर एक ब्रह्मण परिवार में हूँ, अपितु मैं इसलिए स्वयं को ब्राह्मण कहता हूँ क्यूँकि मैं कर्म से एक शोधकर्ता एवं एक छात्र हूँ. और मेरे सभी साथी जो मेरे साथ शोध कर रहे हैं वो भी इसी प्रकार से ब्रह्मण ही हैं, भले ही वो किसी भी परिवार में जन्म लिए हो. ब्राह्मणों का एक महत्वपूर्ण कर्त्तव्य धर्म की रक्षा है. मुझे ये ज्ञात है की जन्म-परायण-जातिवाद ने मेरे धर्म को कलुषित किया है. अतः एक ब्राह्मण होने के नाते मैं जन्म-परायण-जातिवाद का घोर विरोधी हूँ, और कर्म-परायण-जातिवाद को ही महत्व देता हूँ. यह मेरा ब्रह्मणवाद है, और ऐसा ही वास्तविक ब्रह्मणवाद होता है और होना चाहिए।
मैं यह स्वीकार कर सकता हूँ कि ब्रह्मणवाद के पीछे से बहुत से लोग समाज में कुरीतियों को पोषित करते रहे हैं, किन्तु यह कदापि स्वीकार नही कर सकता हूँ कि ''ब्रह्मणवाद'' शब्द ही अपने में नकारात्मक है. अब बहुत से "बुद्धिजीवी" वर्ग के लोग "श्रमजीवियों" को नीचा देखते हैं. इसका अर्थ ये हो सकता है कि नीचा देखना बुरी बात है और वो जो नीचा देखते हैं वो भी बुरे हो सकते हैं. किन्तु इसका अर्थ ये तो बिलकुल नही है कि सभी बुद्धिजीवी बुरे हैं, अथवा बुद्धिजीवी होना (बुद्धिजीवीवाद) बुरी बात है.
जिस दिन वास्तविक ब्राह्मणवाद को बढ़ावा मिल जाएगा उस दिन से सामाजिक व्यवस्था सुधर जाएगी। जातिवाद के पृष्ठभूमि में होने वाले सभी दुर्व्यवहार समाप्त हो जाएंगे।

बहुत दु:खद बात है कि मेरे एक मित्र जो कि जन्मानुसार अनुसूचित जाति से हैं और लखनऊ के एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में शिक्षक हैं, उनके साथ अभी भी भेद भाव होता है. कई सारे उनके सहशिक्षक जो कि ऊंची जाति से हैं वो उनके साथ खाने की मेज पर नहीं बैठते, उनसे खाने की कोई भी वस्तु स्वीकार नही करते (हाँ, अपनी तरफ से कुछ खाने की वास्तु अवश्य देते हैं कभी कभी), दूसरों को ये कहते हैं कि "वो छोटी जाति का है उसके साथ न बैठो".

ये नीच व्यवहार शिक्षक होते हुए बहुत से लोग कर रहे हैं, अत्यंत दुःखदायी है ये.

जो मनुष्य दूसरे मनुष्य का सम्मान नहीं कर सकता वो किसी भी प्रकार से ऊंचा नहीं है, अपितु स्वयं ही उच्च कोटि के घृणा का पात्र है. 

आप विधायकों की वेतन वृद्धि । AAP MLA 's pay hike

आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार द्वारा सैलरी बढ़ाना गलत हो सकता है, पर अगर "आप" प्रवक्ता भाजपा के अंगुली उठाने की प्रतिक्रया में अपने विधायकों के आवश्यक व्ययों की सूची देकर ये पूछते हैं कि "भाजपा या कांग्रेस के पूर्व विधायक उस सूची के खर्चे कैसे उठाते थे?" तो इस बात का उत्तर भाजपा को देना चाहिए.

हम तो जनता हैं, हमें अगर लगे की वेतन बहुत अधिक है, तो चलता है. किन्तु भाजपाई और कांग्रेसी विधायकों और सांसदों को इस बात का उत्तर तो देना ही चाहिए, कि कैसे वो अपना खर्चा चलाते थे.

अगर केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों के मध्य में कोई बलात्कार के आरोपी को हम मात्र इस बात पर सह सकते हैं की मोदी जी से हमें आशा है, उन्हें समय देकर अवश्य देखना चाहिए, तब थोड़ा समय तो हमें इन आम आदमी पार्टी के विधायकों और नेतृत्व को भी देना चाहिए।

२ - ३ सालों में इन सभी आशाओं का वास्तविक चरित्र सामने आ जाएगा.

आशा यही है कि इनमें से जो भी नाकारा होगा वो धराशायी अवश्य होगा इस जनतंत्र में.