प्रिय मित्र,
सुना है कि तुम आज कल समाज में हो रही उथल-पुथल से बहुत व्याकुल हो। तुम निष्क्रिय होते या अप्रभावी होते विभिन्न रंगों के आन्दोलनों से भी बहुत दुखी हो।
भाई मेरे, ये तो रात है, सुबह का आलम अभी देखा ही कहाँ है। आपने तो चार-पांच रंगो की बात की है। सिर्फ ३ बाइट्स को ले लें तो 512 रंग बन सकते हैं। वैसे तो अनेकों रंग संभव हैं। आज नीला काम नहीं कर रहा, तो कोई नहीं साहब, कल आसमानी बना लेंगे। कल आसमानी काम नहीं करेगा तो बैंगनी किसी और ने प्रयोग थोड़े ही किया है, वही ले लेंगे। आज गेरुवे और हरे को गाली दे लेंगे, और कल इनसे प्रेम करके नारंगी और धानी को गालियां दे लेंगे।
रंग को स्थापित करने से कुछ नहीं होगा, रंग तो समय के साथ फीका पड़ ही जाता है। चटक करना है तो उसे करना होगा जिसपर हम रंग पोतने की बात करते हैं। इंसानों को। जब तक वो नहीं समझेंगे तब तक कुछ नहीं होगा। हाँ उनको समझाना बहुत दुष्कर है। ख़ैर, अगर वो नहीं समझ रहे तो कम से कम हम उनको समझ लें। दुनिया भर के बिसनेस आज कल यूजर मॉडल ही समझ-समझ कर तो अपना धंधा चमका रहे हैं, हम क्यूँ नहीं चमका सकते। रंग तो उस बेलबॉटम की तरह है, जो आज रहता है, कल चला जाता है, और परसों फिर आ जाता है। पर बेलबॉटम पहनने वालों की फितरत तकरीबन वैसी की वैसी ही रहती है।
नीले वाले सफ़ेद के खिलाफ लड़ते हैं, गेरुवे और हरे एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं, और बस ऐसे ही चलता रहता है। सब फीके होते रहेंगे और सब लड़ते रहेंगे।
हमें हज़ार मूवमेंट्स नहीं चाहिए, सिर्फ एक ही चाहिए। प्रो-इंसानियत। लेफ्ट थेफ़्ट नहीं चाहिए, राइट फाइट नहीं चाहिए, बहुजन दुर्जन नहीं चाहिए। हमें इंसानों की नहीं, इंसानियत की मुहिम की दरकार है।
तुम्हारा को-इंसान,
शीतांशु
सुना है कि तुम आज कल समाज में हो रही उथल-पुथल से बहुत व्याकुल हो। तुम निष्क्रिय होते या अप्रभावी होते विभिन्न रंगों के आन्दोलनों से भी बहुत दुखी हो।
भाई मेरे, ये तो रात है, सुबह का आलम अभी देखा ही कहाँ है। आपने तो चार-पांच रंगो की बात की है। सिर्फ ३ बाइट्स को ले लें तो 512 रंग बन सकते हैं। वैसे तो अनेकों रंग संभव हैं। आज नीला काम नहीं कर रहा, तो कोई नहीं साहब, कल आसमानी बना लेंगे। कल आसमानी काम नहीं करेगा तो बैंगनी किसी और ने प्रयोग थोड़े ही किया है, वही ले लेंगे। आज गेरुवे और हरे को गाली दे लेंगे, और कल इनसे प्रेम करके नारंगी और धानी को गालियां दे लेंगे।
रंग को स्थापित करने से कुछ नहीं होगा, रंग तो समय के साथ फीका पड़ ही जाता है। चटक करना है तो उसे करना होगा जिसपर हम रंग पोतने की बात करते हैं। इंसानों को। जब तक वो नहीं समझेंगे तब तक कुछ नहीं होगा। हाँ उनको समझाना बहुत दुष्कर है। ख़ैर, अगर वो नहीं समझ रहे तो कम से कम हम उनको समझ लें। दुनिया भर के बिसनेस आज कल यूजर मॉडल ही समझ-समझ कर तो अपना धंधा चमका रहे हैं, हम क्यूँ नहीं चमका सकते। रंग तो उस बेलबॉटम की तरह है, जो आज रहता है, कल चला जाता है, और परसों फिर आ जाता है। पर बेलबॉटम पहनने वालों की फितरत तकरीबन वैसी की वैसी ही रहती है।
नीले वाले सफ़ेद के खिलाफ लड़ते हैं, गेरुवे और हरे एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं, और बस ऐसे ही चलता रहता है। सब फीके होते रहेंगे और सब लड़ते रहेंगे।
हमें हज़ार मूवमेंट्स नहीं चाहिए, सिर्फ एक ही चाहिए। प्रो-इंसानियत। लेफ्ट थेफ़्ट नहीं चाहिए, राइट फाइट नहीं चाहिए, बहुजन दुर्जन नहीं चाहिए। हमें इंसानों की नहीं, इंसानियत की मुहिम की दरकार है।
तुम्हारा को-इंसान,
शीतांशु