Sunday, February 28, 2016

तिरंगा और भारतीयता ।। Tiranga and Indianism

मैं स्वघोषित श्रेष्ठ पत्रकार अर्णब गोस्वामी की एक बहस देख रहा था। व्यक्तिगत रूप से मुझे उनकी पत्रकारिता अरुचिकर हैं, किन्तु विषय अच्छा था। बहस हो रही थी कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में यदि तिरंगा लहराने का आदेश केंद्र सरकार देती है तो इसमें क्या गलत है?
पहली बात तो ये कि केंद्र सरकार के पास अधिकार है ऐसा आदेश देने का। दूसरी बात ये कि यदि केंद्र सरकार भारतीयता (भारत एक सम्प्रभुत्व वाला राष्ट्र है) के भाव को बढाने के लिए तिरंगे का सहारा ले रही है तो ये सराहनीय भी है। यूरोप के एक नए देश लिथुएनिया में मैंने देखा कि बहुत सी जगहों पर उनके राष्ट्रीय ध्वज के साथ साथ यूरोपियन यूनियन का ध्वज भी लहरा रहा था। मुझे उस देश के संसद में कुछ ६-७ दिनों का कार्य था। मुझे अवसर मिला तो मैंने संसद के एक अधिकारी से ये पूछा कि हर जगह राष्ट्रीय ध्वज के संग यूरोपियन संघ के ध्वज क्यूँ हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि यूरोपियन संघ के ध्वज से बाहरियों को ये सन्देश मिलता है कि वो शक्तिशाली यूरोपियन संघ के एक अंग हैं। उनका देश 1991 में ही संपूर्ण रूप से प्रजातांत्रिक स्वतंत्र राष्ट्र बना है, अपने ही देशवासियों में राष्ट्रीयता का भाव जगाने में राष्ट्रीय ध्वज महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः उनके अनुसार ध्वजों के होने का कुछ तो महत्व अवश्य है।
मैं यह नहीं कह रहा कि ध्वज एक मात्र युक्ति है देश के प्रति लगाव बढाने का, किन्तु ये एक युक्ति अवश्य है। कितनी प्रभावी है ये भी नहीं कह सकता, किन्तु कुछ प्रभावी तो है ही। पिछले ही महीने मैं केरल में घूम रहा था। 26 जनवरी की सुबह मेरी कार कन्याकुमारी से केरल में पोंमुडी, केरल की दिशा में जा रही थी। मैंने मार्ग में ढेर सारे लाल रंग के झंडे देखे, कांग्रेस के झंडे देखे, भाजपा के भी झंडे देखे, किन्तु 26 जनवरी के दिन तिरंगा नही दिख रहा था। बहुत देर बात मार्ग में एक बस अड्डा दिखा, वहां पर तिरंगा लहरा रहा था। अब तनिक विचार करिए कि वो सरकारी बस अड्डा ना होता तो शायद मुझे तिरंगा और कठिनाई से दिखता। थोड़ा और विचार करिए कि वहां के विद्यार्थियों को कितना लगाव होगा तिरंगे से यदि उन्हें तिरंगा मात्र राष्ट्रीय दिवसों पर ही दिखे वो भी कहीं कहीं। इतनी भी क्या बौद्धिक विवशता है कि हम अपने राष्ट्रीय ध्वज को देश में कहीं फहराने का आदेश नहीं स्वीकार सकते। किसी बच्चे से पूछा गया था कि गणतंत्र दिवस क्या होता है, उसने कहा कि उस दिन उसे स्कूल में लड्डू मिलता है। अगर हम ऐसे ही बौद्धिक स्वतन्त्रता पर देशभाव को छोड़ देंगे और अलग से कुछ कदम नहीं उठाएंगे तो संविधान की जगह पर लड्डू अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।

Thursday, February 11, 2016

Patriotism । देशभक्ति

JNU में क्या ड्रामा चल रहा ये तो पूरी तरह से हम नहीं कह सकते क्यूंकि अधिकतर न्यूज़ चैनलों ने, जिसने रिपोर्ट की भी है उसमें भी विद्रोही छात्रों की बात नहीं बतायी गयी है. उनके साक्षात्कार अधिक नहीं दिखाए गए हैं. अधिकतर रिपोर्टों में यही दिखाया गया है कि वो गद्दार हैं, देश द्रोही हैं. अगर उन छात्रों ने "भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी… " के नारे लगाएं हैं तो उन पर तो देश द्रोहियों के अनुरूप कार्यवाही होनी चाहिए और शीघ्र होनी चाहिए। किन्तु किसी भी सूरत में उन्हें पूरा सुनना भी चाहिए।
ना सुनने से भी हम भारत की ही हानि कर रहे हैं, हमें ये सिद्ध करना चाहिए की भारत में विरोधियों को भी अच्छे से सुना जाता है.
अतः न्यूज़ चैनलों से विनती है कि पहली बात सभी न्यूज़ चैनल इस समाचार को दिखाएँ, दूसरी बात सभी समाचार चैनल इस न्यूज़ को अच्छे से दिखाएँ - हर पक्ष की बात सुनवाते हुए।
जब तक खुली बहस नही होगी तब तक किसी को पता ही नहीं चलेगा कि अगर कोई देश द्रोह कर भी रहा है तो कैसे। भारत - पाकिस्तान का क्या मुद्दा है, कश्मीर का क्या मुद्दा है, बंटवारे में क्या समस्या हुई थी, नेहरू का पाकिस्तान के साथ क्या समझौता हुआ था संयुक्त राष्ट्र संघ के सामने, क्यों हुआ था, अभी क्या स्थिति है कश्मीरी नागरिकों की, कश्मीरी पंडितों के साथ किसने क्या किया किया था, आफ़्सपा क्या बला है - इसका लाभ क्या है और इससे हानि क्या है,...... ऐसी अनेकों आवश्यक बातें हैं जो देश के असंख्य देशभक्त नागरिकों को नहीं पता है. "भारत माता की जय" के नारे लगा लेने मात्र से कोई देश भक्त नही बन जाता। अगर देश भक्ति करनी है तो आप सीमा पर जाकर देश रक्षा करिये, या फिर अपने वर्तमान कार्य को भी देश की भलाई के बारे में सोच कर करिये।
रेल आरक्षण अधिकारी आरक्षण खिड़की पर बैठ कर टिकट ब्लैक करे और अपने लिविंग रूम में बैठ कर "भारत माता की जय" करे, ये नहीं चलेगा। डॉक्टर अपने मरीज़ों का इलाज पैसों की लालच में न करे या गलत करे और अपने लिविंग रूम में बैठ कर "भारत माँ की जय" बोले, ये नहीं चलेगा। ठेकेदार, इंजीनियर देश का पैसा खाने के बाद राजनीति की चर्चा करते हुए "भारत माँ की जय" करें, ये भी नहीं चलेगा। यहां तक कोई नागरिक अगर मात्र जाति, धर्म, समुदाय, धन या मदिरा इत्यादि से प्रभावित होकर भारतीय गणतंत्र में मतदान करे और "भारत की जय" बोले, ये भी नहीं चल सकता।
अगर वास्तव में देश भक्ति करनी है तो पढ़िए, खूब पढ़िए, जानकार बनाइये स्वयं को। मूर्ख न रहिये। आप को समझ में आना चाहिए कि आपके प्रत्येक कदम का प्रभाव देश पर पड़ता है.