Wednesday, August 10, 2016

लोकतंत्र में लोग कहाँ है? । Where are the people in "We the people"?

एक सामान्य सी बात है - दिल्ली सरकार को दिल्ली वालों ने चुना है, केंद्र सरकार को सारे देश ने, केरल के लोगों ने भी, उत्तर प्रदेश के लोगों ने भी, बंगाल के लोगों ने भी, दिल्ली के लोगों ने भी, मणिपुर के लोगों ने भी और पूरे भारत ने... अब अगर दिल्ली प्रदेश की सामान्य बातों का निर्णय लेने का अधिकार तो मात्र उसे ही होना चाहिए जिसे मात्र दिल्ली के लोगों ने चुना हो... न कि जिसे मणिपुर, केरल या किसी और प्रांत के लोगों ने चुन के भेजा हो... माना की दिल्ली वालों ने भी चुना था बीजेपी सरकार को, किन्तु देश स्तर निर्णय लेने के लिए, प्रदेश स्तर के निर्णय लेने के लिए नहीं।
प्रबुद्ध लोग तनिक विचार करें, अगर आपने अपने गाँव या सोसाइटी या मोहल्ले का कोई प्रतिनिधि चुना, और वो कल को आकर के आपको ये बोले की आपके घर में आज पराठा नहीं सिर्फ चावल ही बनेगा, या फिर वो ये कहने लगे आप 5 बजे जागने के बजाय 4 बजे जागिये... क्या ये स्वीकार होगा? आपके घर पर क्या बने ये आपका परिवार तय करेगा ना की कोई बाहरी... हां, इस मामले में उस अपने मोहल्ला/ सोसाइटी/ गाँव के प्रतिनिधि को हम बाहरी ही कहेंगे, भले ही उसे हमने भी चुना हो...
दिल्ली, 2011 की जनगणना के अनुसार जिसकी जनसँख्या जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमांचल प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम जैसे पूर्ण राज्यों से भी अधिक है, वहां पर पर लोकतांत्रिक अधिकारों बात करी तो जा ही सकती है... उचित तो यही होना चाहिए कि लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले भारतवर्ष के सभी नागरिकों और सभी दलों को भव्य स्तर पर दिल्ली के लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में संघर्ष करना चाहिए... जो राजनीतिक दल इस संघर्ष में मौन रहना अथवा इस संघर्ष में खलनायक बनना चुन रहे हैं उन्हें अपने नकली लोकतांत्रिक आडंबरों को त्याग देना चाहिए, क्योंकि एक चरम पर उबलने के बाद भगौने से दुग्ध बाहर तभी नहीं आता जब भगौने में दुग्ध कम हो, किन्तु भारत में भाग्यवश बहुत सारा "लोक" भरा हुआ है...
स्मरण रहे कि यदि इस देश में 1 करोड़ सढ़सठ लाख लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार प्रश्न में आ सकते हैं तो पता नहीं कब 16 करोड़ लोगों के लिए भी प्रश्न उठ जाएं!

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