एक तरफ कहते हैं कि द्रोणाचार्य हमारे इतिहास के नहीं अपितु साहित्य के एक पात्र हैं, वो महाभारत को एक मिथक बताते हैं। दूसरी तरफ वही ये कहते हैं कि एकलव्य के साथ अन्याय किया था द्रोणाचार्य ने, ऐसे व्यक्ति को हम महान गुरु क्यों माने, ऐसे व्यक्ति को देश के आदिवासी और दलित क्यों स्वीकारेंगे। भाई ये अच्छा है। जब दलित/ आदिवासी वाला तर्क रखना हो तब महाभारत को मात्र इसलिए सत्य मान लिया जाता है क्यूंकि इससे भारत के व्याप्त जातिवाद के विरोध को शक्ति मिलती है।
ये तो इतिहासकार जाने कि वो महाभारत कथा के कितने हिस्से को इतिहास और कितने हिस्से को साहित्य मानते हैं, और क्यों?
मैं तो बस इतना जानता हूँ कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य या किसी और को इसलिए पढ़ाने से मना नहीं किया था क्यूंकि वो जातिवादी थे, अपितु उन्होंने हस्तिनापुर के राजकुमारों को ही पढ़ाने का वचन दिया था। उन्होंने एकलव्य का अंगूठा इसलिए नहीं कटवाया था क्यूंकि एकलव्य आदिवासी या दलित था, उन्होंने ये इसलिए किया था क्यूंकि वो अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ देखना चाहते थे, और एकलव्य शत्रु-राज्य का भावी योद्धा भी था। इस बात से ये कदापि सिद्ध नहीं होता कि वो बुरे आचार्य थे। हाँ हो सकता है कि वो आचार्य के साथ साथ एक कूटनीतिज्ञ भी थे। पर इसमें जातिवाद वाला दृष्टिकोण नहीं दिखता। हाँ, ये बात अवश्य है कि एकलव्य के साथ अच्छा नहीं हुआ और जो भी हुआ वो द्रोणाचार्य के कारण भी हुआ। किन्तु ये जो भी हुआ वो द्रोणाचार्य और एकलव्य के मध्य की बात है, इसपर हमें प्रश्न कैसे कर रहे हैं? अब द्रोणाचार्य ने अंगूठा माँगा और एकलव्य ने दे भी दिया। अब यदि ये गलत था तो एकलव्य ने ऐसी गुरुदक्षिणा देने से मना क्यों नहीं किया? या फिर उसे अपनी मूर्ति बनानी चाहिए थी और उस मूर्ति के दाहिने हाथ का अंगूठा काट कर दे देना चाहिए था, अब उसने द्रोणाचार्य के मूर्ति को ही तो उनके प्रतीक के रूप में माना था, तो अपने मूर्ति को अपना प्रतीक मान लेता।
अगर ये गलत था तो द्रोणाचार्य के साथ साथ एकलव्य भी उत्तरदायी थे इस बात के लिए। नहीं तो इस बात को गुरु-शिष्य के मध्य का व्यक्तिगत प्रसंग माना जाना चाहिए। सामाजिक-न्याय वाला कोण तो कहीं नहीं दिखता, और यदि थोड़े देर के लिए ये मान लिया जाए कि सामाजिक-न्याय का कोण है भी तो ये तो प्रत्यक्ष है कि इसमें गलती द्रोण और एकलव्य दोनों की ही थी - एक ने अन्याय किया और दूसरे ने शक्ति होने के उपरान्त भी अन्याय सहा। समाज को तो दोनों ने मिलकर गलत उदाहरण दिया यदि इसमें समाजिक न्याय का कोई कोण है, तो। वैसे सामाजिक-न्याय वाला कोण नहीं है एकलव्य के प्रसंग में। हां, राजनीतिक और कूटनीतिक कोण अवश्य है।
वैसे अगर सामजिक न्याय की बात ही करें द्रोण के सन्दर्भ में तो जो महाभारत की कथा को जानता है वो द्रोण के इतिहास को भी जानता होगा। द्रोण एक ऐसा उदाहरण है जो ये बताता है कि महाभारत काल में ब्राह्मणों को भी भोजन के लिये संघर्ष करना पड़ता था। ब्राह्मण भी गरीब होते थे। एक ब्राह्मण के बच्चे को भी भोखा सोना पड़ता था। एक ब्राह्मण को एक शक्तिशाली राजा के सामने विनती करनी पड़ती थी। एक ब्राह्मण को एक क्षत्रीय होते हुए भी एक राजा के द्वारा अपमान सहना पड़ा था। कौशल होते हुए भी उसे काम के लिए भटकना पड़ा। और फिर एक किसी तो अन्य राज्य के द्वारा नौकरी मिलने पर उसको अपनी शिक्षा को मात्र उस राजवंश तक सीमित रखना पड़ा। आजकल भी कई ऐसी विशेष नौकरियां हैं जो आपसे ये मांग करती हैं कि आप अपने कौशल का प्रयोग उस उस संस्थान/कंपनी के अलावा किसी के लिए नहीं करेंगे। द्रोण ने अपने नियोक्ता (एम्प्लायर) के प्रति इतनी ईमानदारी दिखाए थी कि ब्राह्मण होते हुए उन्होंने युद्ध में भाग लिया। अब अगर वो इतने बड़े स्वार्थी या जातिवादी होते तो ब्राह्मण होते हुए युद्ध में जाकर स्वयं के प्राण को संकट में क्यों डालते। इन सब बातों से तो ये लगता है कि क्या हम जिसे ब्राह्मणवाद कहते हैं क्या वो वास्तव में था भारत में? यहाँ तो एक ब्राह्मण को गरीबी में संघर्ष करना पड़ा, दर दर की ठोकर कहानी पड़ी, स्वयं को किसी (सिंघासन) के प्रति समर्पित करना पड़ा। इससे ये अवश्य लगता है कि समाज में कुछ ही शक्तिशाली व्यक्ति थे (किसी भी कुल के हों) जो राज करते थे, और बहुत से ऐसे लोग थे जिनका शोषण होता था, जिन्हे स्वयं के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता था। ऐसा तो आधुकनिक काल में भी हो ही रहा है। वैसे अब यदि कोई जातिवाद के लिए ब्राह्मणों को उत्तरदायी मानकर "ब्राह्मणवाद" को "जातिवाद" का पर्यायवाची मान ले तो ये उन सभी "ब्राह्मणों" के साथ अन्याय होगा जो इसके विरोध में हैं या थे, और जिन्होंने स्वयं पर सामजिक अन्याय सहा हो। अतः द्रोणाचार्य का सन्दर्भ सामाजिक अन्याय के अलग चरित्र को सामने लाता है जो अभी भी बहुत से बुद्धिजीवियों द्वारा या तो तिरस्कृत है, या छुवा ही नहीं गया।
वैसे, ये सब बातें उनके लिए तो बिलकुल ही नहीं है जो महाभारत को ही गलत मानते हैं। चलिए अब दृष्टि डालते हैं कि महाभारत कितनी कवी की कल्पना है और कितनी इतिहास है। अब शिमला में घटोतकच्छ और हिडिम्बा का मंदिर सदियों से है, लखनऊ के पास के नैमिसार में अभिमन्यु का चक्रकुंड वर्षों से है। भारत में द्वारका, वृन्दावन, मथुरा, हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ इत्यादि नगर अभी भी हैं। भारत में अनेकों ऐसे स्थान हैं जहाँ से महाभारत की कथा में उल्लेखित पात्र और तत्त्व के होने की बात निकल कर आती हैं. अब ये बताइए कि एक कथाकार महाभारत लिखता है, और फिर वो भारत भर में घूम-घूम कर ये कहता है और करवाता है कि यहां पर आप हिडिम्बा का मंदिर बना दीजिये। फिर १०० किलोमीटर दूर किसी और से अभिमन्यु का चक्रकुंड बनवा देता है। फिर गुजरात में जाकर के एक नगर का नाम द्वारका रखवा देता है। फिर दिल्ली में आकर के वहां इंद्रप्रस्थ नाम रखवाता है, और पास ही में किसी नगर का नाम हस्तिनापुर रखवा देता है। वो इतना कुछ मात्र इसलिये करता है क्योंकि वो ये चाहता है कि उसकी काल्पनिक कथा को लोग इतिहास मान लें! ऐसा हो सकता है क्या?
क्या उपहास है वैज्ञानिक सोच का! हाँ, ये माना कि कुछ मायावी सन्दर्भ एक साहित्यकार की उपज हो सकती है, किन्तु सम्पूर्ण महाभारत को मात्र एक काल्पनिक साहित्य हम कैसे मान सकते हैं? कोई इतना प्रभावी साहित्यकार जगह जगह जाकर के अपनी रचना के मिथ्या सत्य को स्थापित करने की यदि इतनी ही शक्ति रखता तो आज वो (वेदव्यास) कदाचित भारत के एक शक्तिशाली व्यक्ति में गिना जा रहा होता।
ये तो हम सभी अनेकों देशॊ के उदाहरण से समझ सकते हैं कि बहुत से लोग इतिहास को एक काव्य के रूप में संचित करते थे। काव्य मात्र कल्पना है या उसमें इतिहास भी सुरक्षित किया गया है ये तो हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही पता लगा सकते हैं। अच्छी बात तो ये है कि किसी भी बात को आँख बंद कर के मान लेना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता और ना ही किसी भी बात को आँख बंद करके गलत, मिथ्या या मिथक कह देना वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
ये तो इतिहासकार जाने कि वो महाभारत कथा के कितने हिस्से को इतिहास और कितने हिस्से को साहित्य मानते हैं, और क्यों?
मैं तो बस इतना जानता हूँ कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य या किसी और को इसलिए पढ़ाने से मना नहीं किया था क्यूंकि वो जातिवादी थे, अपितु उन्होंने हस्तिनापुर के राजकुमारों को ही पढ़ाने का वचन दिया था। उन्होंने एकलव्य का अंगूठा इसलिए नहीं कटवाया था क्यूंकि एकलव्य आदिवासी या दलित था, उन्होंने ये इसलिए किया था क्यूंकि वो अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ देखना चाहते थे, और एकलव्य शत्रु-राज्य का भावी योद्धा भी था। इस बात से ये कदापि सिद्ध नहीं होता कि वो बुरे आचार्य थे। हाँ हो सकता है कि वो आचार्य के साथ साथ एक कूटनीतिज्ञ भी थे। पर इसमें जातिवाद वाला दृष्टिकोण नहीं दिखता। हाँ, ये बात अवश्य है कि एकलव्य के साथ अच्छा नहीं हुआ और जो भी हुआ वो द्रोणाचार्य के कारण भी हुआ। किन्तु ये जो भी हुआ वो द्रोणाचार्य और एकलव्य के मध्य की बात है, इसपर हमें प्रश्न कैसे कर रहे हैं? अब द्रोणाचार्य ने अंगूठा माँगा और एकलव्य ने दे भी दिया। अब यदि ये गलत था तो एकलव्य ने ऐसी गुरुदक्षिणा देने से मना क्यों नहीं किया? या फिर उसे अपनी मूर्ति बनानी चाहिए थी और उस मूर्ति के दाहिने हाथ का अंगूठा काट कर दे देना चाहिए था, अब उसने द्रोणाचार्य के मूर्ति को ही तो उनके प्रतीक के रूप में माना था, तो अपने मूर्ति को अपना प्रतीक मान लेता।
अगर ये गलत था तो द्रोणाचार्य के साथ साथ एकलव्य भी उत्तरदायी थे इस बात के लिए। नहीं तो इस बात को गुरु-शिष्य के मध्य का व्यक्तिगत प्रसंग माना जाना चाहिए। सामाजिक-न्याय वाला कोण तो कहीं नहीं दिखता, और यदि थोड़े देर के लिए ये मान लिया जाए कि सामाजिक-न्याय का कोण है भी तो ये तो प्रत्यक्ष है कि इसमें गलती द्रोण और एकलव्य दोनों की ही थी - एक ने अन्याय किया और दूसरे ने शक्ति होने के उपरान्त भी अन्याय सहा। समाज को तो दोनों ने मिलकर गलत उदाहरण दिया यदि इसमें समाजिक न्याय का कोई कोण है, तो। वैसे सामाजिक-न्याय वाला कोण नहीं है एकलव्य के प्रसंग में। हां, राजनीतिक और कूटनीतिक कोण अवश्य है।
वैसे अगर सामजिक न्याय की बात ही करें द्रोण के सन्दर्भ में तो जो महाभारत की कथा को जानता है वो द्रोण के इतिहास को भी जानता होगा। द्रोण एक ऐसा उदाहरण है जो ये बताता है कि महाभारत काल में ब्राह्मणों को भी भोजन के लिये संघर्ष करना पड़ता था। ब्राह्मण भी गरीब होते थे। एक ब्राह्मण के बच्चे को भी भोखा सोना पड़ता था। एक ब्राह्मण को एक शक्तिशाली राजा के सामने विनती करनी पड़ती थी। एक ब्राह्मण को एक क्षत्रीय होते हुए भी एक राजा के द्वारा अपमान सहना पड़ा था। कौशल होते हुए भी उसे काम के लिए भटकना पड़ा। और फिर एक किसी तो अन्य राज्य के द्वारा नौकरी मिलने पर उसको अपनी शिक्षा को मात्र उस राजवंश तक सीमित रखना पड़ा। आजकल भी कई ऐसी विशेष नौकरियां हैं जो आपसे ये मांग करती हैं कि आप अपने कौशल का प्रयोग उस उस संस्थान/कंपनी के अलावा किसी के लिए नहीं करेंगे। द्रोण ने अपने नियोक्ता (एम्प्लायर) के प्रति इतनी ईमानदारी दिखाए थी कि ब्राह्मण होते हुए उन्होंने युद्ध में भाग लिया। अब अगर वो इतने बड़े स्वार्थी या जातिवादी होते तो ब्राह्मण होते हुए युद्ध में जाकर स्वयं के प्राण को संकट में क्यों डालते। इन सब बातों से तो ये लगता है कि क्या हम जिसे ब्राह्मणवाद कहते हैं क्या वो वास्तव में था भारत में? यहाँ तो एक ब्राह्मण को गरीबी में संघर्ष करना पड़ा, दर दर की ठोकर कहानी पड़ी, स्वयं को किसी (सिंघासन) के प्रति समर्पित करना पड़ा। इससे ये अवश्य लगता है कि समाज में कुछ ही शक्तिशाली व्यक्ति थे (किसी भी कुल के हों) जो राज करते थे, और बहुत से ऐसे लोग थे जिनका शोषण होता था, जिन्हे स्वयं के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता था। ऐसा तो आधुकनिक काल में भी हो ही रहा है। वैसे अब यदि कोई जातिवाद के लिए ब्राह्मणों को उत्तरदायी मानकर "ब्राह्मणवाद" को "जातिवाद" का पर्यायवाची मान ले तो ये उन सभी "ब्राह्मणों" के साथ अन्याय होगा जो इसके विरोध में हैं या थे, और जिन्होंने स्वयं पर सामजिक अन्याय सहा हो। अतः द्रोणाचार्य का सन्दर्भ सामाजिक अन्याय के अलग चरित्र को सामने लाता है जो अभी भी बहुत से बुद्धिजीवियों द्वारा या तो तिरस्कृत है, या छुवा ही नहीं गया।
वैसे, ये सब बातें उनके लिए तो बिलकुल ही नहीं है जो महाभारत को ही गलत मानते हैं। चलिए अब दृष्टि डालते हैं कि महाभारत कितनी कवी की कल्पना है और कितनी इतिहास है। अब शिमला में घटोतकच्छ और हिडिम्बा का मंदिर सदियों से है, लखनऊ के पास के नैमिसार में अभिमन्यु का चक्रकुंड वर्षों से है। भारत में द्वारका, वृन्दावन, मथुरा, हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ इत्यादि नगर अभी भी हैं। भारत में अनेकों ऐसे स्थान हैं जहाँ से महाभारत की कथा में उल्लेखित पात्र और तत्त्व के होने की बात निकल कर आती हैं. अब ये बताइए कि एक कथाकार महाभारत लिखता है, और फिर वो भारत भर में घूम-घूम कर ये कहता है और करवाता है कि यहां पर आप हिडिम्बा का मंदिर बना दीजिये। फिर १०० किलोमीटर दूर किसी और से अभिमन्यु का चक्रकुंड बनवा देता है। फिर गुजरात में जाकर के एक नगर का नाम द्वारका रखवा देता है। फिर दिल्ली में आकर के वहां इंद्रप्रस्थ नाम रखवाता है, और पास ही में किसी नगर का नाम हस्तिनापुर रखवा देता है। वो इतना कुछ मात्र इसलिये करता है क्योंकि वो ये चाहता है कि उसकी काल्पनिक कथा को लोग इतिहास मान लें! ऐसा हो सकता है क्या?
क्या उपहास है वैज्ञानिक सोच का! हाँ, ये माना कि कुछ मायावी सन्दर्भ एक साहित्यकार की उपज हो सकती है, किन्तु सम्पूर्ण महाभारत को मात्र एक काल्पनिक साहित्य हम कैसे मान सकते हैं? कोई इतना प्रभावी साहित्यकार जगह जगह जाकर के अपनी रचना के मिथ्या सत्य को स्थापित करने की यदि इतनी ही शक्ति रखता तो आज वो (वेदव्यास) कदाचित भारत के एक शक्तिशाली व्यक्ति में गिना जा रहा होता।
ये तो हम सभी अनेकों देशॊ के उदाहरण से समझ सकते हैं कि बहुत से लोग इतिहास को एक काव्य के रूप में संचित करते थे। काव्य मात्र कल्पना है या उसमें इतिहास भी सुरक्षित किया गया है ये तो हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही पता लगा सकते हैं। अच्छी बात तो ये है कि किसी भी बात को आँख बंद कर के मान लेना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता और ना ही किसी भी बात को आँख बंद करके गलत, मिथ्या या मिथक कह देना वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
उत्तम अतिउत्तम विश्लेषण किया है बंधू |
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