Friday, March 25, 2016

प्रजातंत्र १०१ - समर्थन और आलोचना । Democracy 101 - Support and Criticism

यदि आप अपने प्रिय नेता से वास्तव में आशा लगाए हुए हैं, तो उनकी बड़ाइयां बताना तो आवश्यक है ही, किन्तु साथ में उनकी कमियां सामने लाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। अब मुझे मेरे प्रधानमंत्री जी से बहुत आशा है इसलिए मैं आलोचनात्मक टिप्पणियां अधिक करना श्रेयस्कर समझता हूँ। अगर वो अच्छा काम कर गए तो चुनाव के पहले उनकी बहुत ही प्रशंसा करूंगा। कुछ लोग समझते हैं कि मैं अरविन्द केजरीवाल का प्रशंसक हूँ। क्षमा करियेगा, मैं उनकी भी आलोचना करना ही प्राथमिक समझता हूँ। हाँ क्यूंकि वो दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं, इसलिए मेरे लिए इस समय वो इतने भी महत्वपूर्ण नहीं हैं कि प्रधानमंत्री के बराबर उनका आलोचनात्मक अध्ययन किया जाए। अगर प्रधानमंत्री जी की कोई त्रुटि नहीं पकड़ी गयी तो इससे पूरे राष्ट्र को हानि हो सकती है, अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री की त्रुटि नहीं पकड़ी गयी तो उससे दिल्ली राज्य को हानि हो सकती है। कौन सी आलोचना कितनी संवेदनशील और महत्वपूर्ण है, यह समझना सरल है।

हाँ किन्तु प्रदेश के मुख्य्मन्त्रियों की भी आलोचना कर लेनी चाहिए - कुछ तो महत्वपूर्ण है ही ये। चलिए, तनिक अब केजरीवाल जी की ही आलोचनाओं की बात कर लेते हैं।  उनका प्रदर्शन एक मुख्यमंत्री के रूप में कितना ही अच्छा या बुरा क्यों ना हो, किन्तु उनके पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक नहीं लगता। इस बात को मैं पहले भी कह चुका हूँ, किन्तु इसे बार-बार इसलिए नहीं कह सकता क्यूंकि पहली बात तो ये कि उनकी पार्टी नयी है, और दूसरे उनके पार्टी के भीतर जो कुछ भी हो रहा है वो दूसरी पार्टियों जैसा/जितना नहीं हो रहा, आशा करते हैं कि समय के साथ सुधार हो जाए। रही बात ४००% वेतन वृद्धि की, तो ये तो सही है कि ये सरलता से पच नहीं रही। देखते हैं कि भविष्य में उनके विधायक कितने दिनों तक इन ४००% के बल पर ईमानदारी से अपना दायित्व निभा सकते हैं। इनके अतिरिक्त और भी आलोचनाएं मैं कर चुका हूँ, और इन सभी बातों पर मेरी दृष्टि बनी हुई है। हम किसी नेता के भक्त नहीं है कि अपनी आंखों को बंद करके उनका समर्थन हर बात पर करते रहें। अगर ऐसा किया तो ये प्रजातंत्र ध्वस्त हो जाएगा। प्रजातंत्र में प्रजा अपना समर्थन कभी भी बदल सकती है।

आलोचना करिये, प्रशंसा करिये - जो कुछ भी करिये किन्तु यह स्मरण रख कर करिये कि ये प्रजातंत्र हमारी अनुभूतियों और विचारों से चल रहा है। अतः चुनाव होने के उपरान्त हमें पर्यवेक्षक या आलोचक की भाँति भी कार्य करना पड़ेगा, और सत्य के प्रचारक के रूप में भी कार्य करना पड़ेगा।

जो कुछ भी लिखिए अथवा साझा करिये, प्रयास करिए कि वो संपूर्ण रूप से सत्य हो। 

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